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$$$$$$$$जय श्री आशापुरा माता जी$$$$$$$

 

              "सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नहीं"

 राजपूत उत्तर भारत का एक क्षत्रिय कुल है, जो कि राजपुत्र का अपभ्रंश है। राजस्थान में राजपूतों के अनेक वंश हैं। राजस्थान को ब्रिटिशकाल मे राजपूताना भी कहा गया है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी, किन्तु बाद में इन वर्णों के अंतर्गत अनेक जातियाँ बन गईं। कवि चंदबरदाई के कथनानुसार राजपूतों की 36 जातियाँ थी। उस समय में क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत सूर्यवंश और चंद्रवंश के राजघरानों का बहुत विस्तार हुआ। राजपूतों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान का नाम सबसे ऊंचा है।

निर्वाण अथवा निर्बा 

राजस्थान के शेखावाटी में रहने वाले चौहान राजपूतों की इस निरबाण शाखा का प्रादुर्भाव कैसे हुआ ? ये शेखावाटी में कहाँ से आये ? इस संबंध में राजस्थान के मूर्धन्य इतिहासकार स्व.सुरजन सिंह जी झाझड़ ने अपनी पुस्तक “शेखावाटी प्रदेश का प्राचीन इतिहास” में बहुत ही बढ़िया व विस्तृत शोधपरक ऐतिहासिक जानकारी दी है| 
कर्नल नाथू सिंह शेखावत ने भी अपनी पुस्तक “अदम्य यौद्धा-महाराव शेखाजी” में महाराव शेखाजी के जन्म स्थान “गढ़ त्योंदा” के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए चौहानों की निरबाण शाखा की ऐतिहासिक जानकारी दी है|

कर्नल नाथू सिंह शेखावत के अनुसार- “निरबाण चौहानों की एक मुख्य खांप है| नाडोल (पाली) के राजा आसपाल की पटरानी वांछलदेवी से माणकराव, मोकळ, अल्हण और नरदेव नामक चार पुत्र हुए| इनमे सबसे छोटा नरदेव महत्वाकांक्षी, दूरदर्शी व शौर्यवान था| वह जानता था कि सबसे छोटा होने के कारण पिता के राज्य से कोई बहुत बड़ा ठिकाना मिलने की संभावना नहीं थी, अत: नरदेव ने पिता के राज्य में मिलने वाला हिस्सा त्याग कर, अन्यत्र अपना राज स्थापित करने के उद्देश्य से, अपने विश्वस्त साथियों के साथ कूच किया| 
उस समय खंडेला पर कुंवरसिंह डाहिल राज करता था| नरदेव ने ने कुंवरसिंह डाहिल पर वर्तमान उदयपुरवाटी के पास वि.स. ११४२ (सन १०८५ई.) में आक्रमण कर उसे परास्त किया तथा खंडेला पर अपना अधिकार कर लिया| इस अप्रत्याशित जीत व पिता के राज में हिस्से के प्रति त्याग से प्रसन्न होकर राजा आसपाल ने नरदेव को आशीर्वाद स्वरूप “निरबाण” की उपाधि से सम्मानित किया| तब से नरदेव निरबाण के नाम से विख्यात हुआ और उसकी संताने निरबाण उपनाम से जानी जाने लगी| अन्य भाइयों की संताने देवरा पुत्र अर्थात देवड़ा कहलाती है|”

उस वक्त उतर भारत में चौहानों का शक्तिशाली राज्य था शेखावाटी के खंडेला के पास संभार पर शक्तिशाली शासक विग्रहराज चौहान का शासन था| नरदेव निरबाण अपने वंशज चौहानों से घनिष्टता का फायदा उठाते हुए सांभर का विश्वसनीय सामंत बन गया और उनकी शक्ति का फायदा उठाते हुए अपने राज्य के पास अरावली घाटी की श्रंखला में उदयपुरवाटी से पूंख, बबाई, पपुरना, खरकड़ा, जसरापुर व त्योंदा तक अपने शक्तिशाली ठिकाने स्थापित कर अपना राज्य विस्तार कर छोटा सा सुदृढ़ राज्य स्थापित कर लिया|

अकबर काल में निरबाणों पर मुग़ल दरबार में उपस्थित होने हेतु निरंतर दबाव पड़ता रहा पर इन्होने न तो कभी अकबर की अधीनता स्वीकार की, न कभी उसे कर दिया, न कभी मुग़ल दरबार में ये नौकरी करने गये| अकबर ने इसे अपनी तौहीन समझी पर इनपर कभी मुग़ल सेना नहीं भेजी कारण साफ था उस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में निरबबाणों की छापामार युद्ध प्रणाली के आगे इन्हें हराना बहुत कठिन था| कई बार पड़ताली मुग़ल दस्ते इन पर चढ़ कर गये पर उन्हें निरबाणों ने हराकर या लूटकर वापस भगा दिया|

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दोहा:- 

राजा रावहि रुल नम्या, नमग्या लोदि पठान ।
अकबरशाह नै न नम्या, राणा और निर्बाण  ।।

 अर्थात: अकबर के साशन  काल में सभी राव, राजा और पठानो ने अकबर की अधीनता स्वीकार करलि थी परन्तु मेवाड़ के राणाओं ने और खंडेला के निरबाणो ने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नही की और न ही उसे कभी कर दिया।    

आखिर रायसल शेखावत ने मुगलों की  सहायता से निरबाणो के सुने किले खंडेला में धोके से  घुसके अपना कब्जा जमाया (उस समय निर्वाण राजा पीपाजी निर्वाण गंगा इस्नान के लिए गये हुए थे। पीछेसे रायसल शेखावत अपने ससुराल वलो से मिलने आने के बहाने किले (खंडेला) में प्रवेश कर कब्जा जमाया था )  उसने पहलेखंडेला बाद में उदयपुर का राज्य छीन इन्हें राज्यहीन कर दिया फिर भी ये कभी मुग़ल सेवा में नहीं गये|

चौहान वंश की कुलदेवी श्री आशापुरा माता जी

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राजस्थान के पाली जिले में नाडोल के शासक परम प्रतापी महाराजा राव लखणसी जी चौहान द्वारा स्थापित माँ श्री आशापुरा माता जी का पवित्र स्थान देवनगर नाडोल का भव्य तीर्थ स्थल है।  कई विशाल पौराणिक मंदिरो और ऐतिहासिक विशाल बावड़ियों और परकोटों की धरोहर को अपनी ओर समेटे देवनगर नाडोल इन बड़े बड़े विशाल मंदिरो के कारण अपनी विशेष पहचान रखे हुए है। 

विक्रम संवत १००१  में नाडोल के कुछ बदमाशों ने काफी उत्पात मचाया और वे वहां की गायों को घेर कर ले गये, उस समय यहाँ के शासक राव लखणसी जी बहुत विकट परस्थितियों से गुजर रहे थे, उनके पास सैनिक की भरी कमी थी, क्यों की कुछ समय पहले किसी बीमारी से उनके अस्तबल के साये घोड़े मर गए थे, ऎसे समय  लखणसी जी ने अपनी कुलदेवी श्री आशापुरा माता जी की आराधना की तब देवी जी ने प्रकट  होकर दर्शन दिये, और कहा राजन धैर्य रखो मैं युद्ध में तुम्हारे साथ लड़ूँगी, तब माता ने यह भी कहा की दुश्मन के घोड़े आज ही तुम्हारी घुड़साल में आ जायेंगे वे सब भंवर रंग के होंगे उन पर केसर के छींटे दे देना तो वे घोड़े सफ़ेद रंग के हो जायेंगे, उन्हें अपने युद्ध  लेना, और जब तक पाटण गुजरात को विजय नहीं कर लो तब तक युद्ध बंद मत करना, और आगे चलकर सब कुछ ऐसा ही हुआ जैसा माता श्री आशापुरा जी ने कहा था, माँ आशापुरा माता जी का मेला हर साल चैत्र मास की अष्ठमी  भरता है, श्री राव लखणसी जी का भव्य जन्मोत्सव भी प्रति वर्ष  मनाया जाता है, जन जन की आराध्य माँ आशापुरा माता जी के दर्शनार्थ भक्त एकत्रित होत्र है, माँ सभी भक्तों के सब दुःख हर लेती है, यह ठहरने व भोजन आदि सभी की व्यवस्थायें मंदिर द्वारा उपलब्ध है।

 

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Major Chandravanshi clans

2010-10-20

 
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2010-10-20

 
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2010-10-19

 
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